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category: article
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date: 2012-02-27T22:47:00
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description: The Big Red Ants
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image: /images/ants.webp
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tags:
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- ants
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- sav
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title: The Big Red Ants
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In a bird's eye view if we see around us, ants are the common and
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tiniest living entitiy seen by naked eye. One of them are the big red
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ants, in my view they are unique from others in two ways, first they
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live on trees and second their anteenas are too long and bent in middle,
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seems like their fore legs. Their mandible (mouth) seems like eagle's
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beak.
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As I observed them making and reparing their nests, I concluded that
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they are very laborious and intellectual. They create their nests by
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binding two or more leaves (maybe up to 500) together. They stich the
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leaves using a stinky white substance either excreted by themselves or
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from trees. This substance is like web of spider. At first builder ants
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creates an array at the blade of two leaves. Then they make ant-cranes
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or ant-chain like chain of monomer to form a polymer. They catch the
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leaves and pull each other to stich. After some time, the parliament of
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leaves transforms into a leaf-sac called their nest. They also weave
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translucent cloth like structure to cover remainings of leaf. A nest
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hangs by a branch of the trees.
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A nest is skillfully divided into living rooms, barracks, storehouse,
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egg room and queen's room. The eggroom, lies at the center of nest to
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protect from outer attack until last time. Besides that, lies queen's
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room. Living rooms are sequenncly joined with eggroom. There are
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different rooms for workers, food searchers etc. The partition of the
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room resembles atom's electron shell, one upon another. At last barracks
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are the outermost rooms, just like outermost orbit of electron. The
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defence system is strongest at the nest's opening. A nest may size as
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2-3 footballs and have 50 to 10000 ants. There may be more openings.
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Now about their attacking and protecting skills. A solider is unique
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from other ants. It is equipped with many attacking and defending
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skills. Normally they do not attack. They are social insects. If someone
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attacks, all other ants go inside, and soldiers come out. They spread
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allover the nest. They are very sensetive and have sharp vision. If any
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one of them see their enemy the stand on their hind legs, swinging,
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their forelegs and anteens in their air as scolding someone. Their spit
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contains formic acid, present at the end of the abdomen below the
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rectum. If their nest is broken and eggs fall on ground then the ants
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make a dome, like the dome of Taj mahal to save the eggs till last their
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breadth. This shows their caring skills.
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The most amazing is their discipline. They can easily beat a human in
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race of discipline. Humans must learn from it. When two ants meet, they
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touch their anteena to communicate. When they walk in a queue, they seem
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like twinkling dots and dashes. I want to conclude that **All tiny
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things are not really tiny. It may be as a space having infinite
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mysteries one has to explore it.**
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Photo Attribution : Photo by Michael Willinger from Pexels:
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category: article
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date: 2019-09-21T15:47:00
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description: प्रकृति की सुंदरता और कलाकारी हिमालय की कण-कण में झलकती है। प्रकृति ने
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प्रेम को भी हिमालय के जितना ही विशाल और अलौकिक बनाया है । ये एक अलग चर्चा का विषय
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है कि हिमालय पहले आया या प्रेम। मैं तो प्रेम के पक्ष में हूँ । वो हर अणु-परमाणु
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जिन्होंने इतने बड़ा पहाड़ खड़ा किया वो सब आपस में प्रेम से बंधे हुए हैं।
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image: /images/fedora-night.webp
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tags:
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- love
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- article
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- hindi
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title: प्रेम रतन धन पायो
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टूटता तारा देखना एक अलौकिक अनुभव है। हिमाद्रि के छत से आसमान कुछ ज्यादा ही करीब प्रतीत होता है । लोग सदियों से हिमालय को पूजते आयें हैं ।
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दादा-दादी कहा करते थे ये जिंदा पहाड़ हैं । सारी बातें सुनते हैं लोगों की । उनके दुख दर्द दूर करते हैं, ये देवता हैं । आजकल जब रोज़ क्लास
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आते जाते दूर पहाड़ों की चोटियाँ देखता हूँ तो उनकी विशालता का अनुभव होता हैं । एक पल को अगर ये मान लिया जाए की हमारी सारी धार्मिक किताबें
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वो कहानियाँ हैं जो पथिक लेखकों के द्वारा लिखी गयी हैं तो सारी बातें साफ हो जाती है कि क्यूँ देवी-देवताओं ने हिमालय को अपनाया है। टूटता
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तारा देखना अलौकिक है पर हिमालय की श्रेणियों से टूटता तारा देखना दैविक है । और वो कहते हैं न जिसमें न कोई तर्क हो न ही हाथों की सफाई वो
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दैविक है। टूटते तारो के बारे में लोगों के बहुत सारे विश्वास हैं । कभी विभीषिका का पूर्वाभास माने जाने वाले इन टूटते तारे आज इच्छा पूरक के
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प्रतीक हैं । कुछ लोगों का ये भी मानना है कि टूटते तारे दिवंगत लोगों का संकेत हैं । हिमालय की कन्दराओं में न जाने कितने ही ऋषि-मुनियों ने
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तप करते हुए अपना जीवन अर्पित कर दिया । इसलिए हिमालय की पहाड़ों से टूटता तारा देखना दैविक हैं क्योंकि शायद वो तारे उन ऋषि-मुनियों की पवित्र
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आत्माओं का संकेत हैं ।
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प्रकृति की सुंदरता और कलाकारी हिमालय की कण-कण में झलकती है। प्रकृति ने प्रेम को भी हिमालय के जितना ही विशाल और अलौकिक बनाया है । ये एक
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अलग चर्चा का विषय है कि हिमालय पहले आया या प्रेम। मैं तो प्रेम के पक्ष में हूँ । वो हर अणु-परमाणु जिन्होंने इतने बड़ा पहाड़ खड़ा किया वो सब
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आपस में प्रेम से बंधे हुए हैं। ये पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, आकाश-गंगा इत्यादि सब प्रेम से बंधे हुए हैं । और हिमाद्रि के छत पर मैं इसी प्रेम
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के आगोश में आकर भावशून्य होकर तारों को निहार रहा था । तभी मानो सदियों की मन्नत पूरी हुई और मुझे एक टूटता तारा दिखा । आप मेरी स्थिति की
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जटिलता का अनुभव इस प्रकार से लगा सकते हैं कि लोग टूटते तारे से मन्नत मांगते हैं और मैं टूटता तारा ही मन्नत में मांग रहा था । इससे पहले की
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मैं पिछली जटिलता से बाहर आता की दूसरी जटिलता सामने आ पड़ी की तारा तो दिख गया पर मैं माँगूँ क्या ? और अगर आप सोच रहे की भाई पैसे मांग लो
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शोहरत , नाम , शक्ति और पता नहीं क्या-क्या ? मांग तो लेता पर अगर आप मेरी जगह इसी स्थिति में होते तो शायद आपको भी ये सब याद न आता । तो मैं
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एक पल को ये आकलन करने लगा की क्या कुछ ऐसा है जिसकी मुझे बहुत जरूरत है पर मेरे पास हो नहीं । और आपको पता है की गहरी सोच में जाने पर अक्सर
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क्या होता है। अब वो लोग जो ये सोच रहे की भाईसाब आप हर कहानी(सच्ची घटना का विवरण वाली कहानी 😊) में सो क्यूँ जाते हैं। सच बताऊँ तो इसका
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कोई सटीक जबाव नहीं है मेरे पास, पर अध्यात्म ये कहता है की जब आप सो रहे होते हैं तो आपका मन चेतना के कई स्थिति से गुजरता है। जब आप परम
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चैतन्य अवस्था में होते हैं तो रहस्य, प्रतिभज्ञान इत्यादि के रास्ते खुल जाते हैं। और विज्ञान ये भी कहता है कि निद्रा के माध्यम से इस
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अवस्था में जाना उतना ही अनिश्चित है जितना किसी बाला का मेरे लिए प्रेम-प्रस्ताव । सरल शब्दों में – मैं कुछ समय के लिए सो गया।
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आज से ठीक 2 महीने पहले अगर ये मुझसे कोई पूछता की क्या चाहिए तुम्हें तो शायद मेरे पास जबाव होता। दोस्त तो बहुत हैं पर जब कोई ऐसा हो जो
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आपके अधूरे वाक्य पूरे कर सके, कोई ऐसा जो आपकी भावनाओं को आपकी तरह समझ सके, कोई ऐसा जो आपको आपके असल रूप में पसंद करता हो । आपको लग रहा
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होगा की मैं एक प्रेमिका का विवरण दे रहा हूँ, पर नहीं या शायद हाँ , मैं समझता हूँ की अधिकतर लोग प्रेमिका शब्द का प्रयोग अनुचित ढंग से करते
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हैं। जहां प्रेम है वहाँ प्रेमी-प्रेमिका होंगे फिर वो भाई-बहन का रिश्ता हो या माँ-बेटे का । एक पल को सोचो तो ऊपर के विवरण के लिए कोई सबसे
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सटीक उत्तर है तो वो है माँ। जब आप उन माँ-बाप जिन्होंने आपको जन्म दिया, आपका पालन-पोषण किया , आपको इस लायक बनाया कि आप इस वक़्त ये लेख पढ़
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पा रहे हैं , उनको अपनी प्रेमी-प्रेमिका नहीं कह सकते तो शायद किसी और लड़के-लड़की को कहने का आपको कोई हक़ नहीं है। पर ये बात निजी समझदारी की
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है और मैं माँ-बाप के बारे में बिलकुल भी बात नहीं कर रहा, इन 2-4 पन्ने में उनको चित्रित कर पाना दुष्कर है। अगर माँ है तो ये अलग व्यक्ति
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क्यूँ ? लोग कहते हैं क्योंकि भगवान हर जगह नहीं हो सकते इसलिए उन्होंने माँ बनाई। पर मैं कहता हूँ माँ भी हर जगह नहीं हो सकती इसलिए भगवान ने
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दोस्त बनाए और विशेष लोग भी बनाए। आज तक बहुत सारे लोग आए-गए , कई बार लगा की शायद वो विशेष व्यक्ति मिलने ही वाला है पर वो भ्रम था शायद ये
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भी हो। मैं ये नहीं कह सकता की मेरी खोज पूर्ण हो गयी पर हाँ एक पड़ाव तो जरूर आ गया है। उस पहली मुलाक़ात में एक पल को ऐसा लगा मानो किसी
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चमत्कारी दर्जी ने कपड़े की जगह एक पूरा आदमी सिल कर दिया हो। सब कुछ एकदम नाप के अनुरूप। शायद कई सालों के बाद मैं खुशियों का बवंडर अपने अंदर
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महसूस कर रहा था। आप पूछेंगे इसमें प्रेम कहाँ है? हिमालय जितना विशाल है उतना ही गहरा भी है , यहाँ भी प्रेम गहराई में है । प्रेम का होना
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जरूरी है दिखावा तो हर कोई कर लेता है। कबीर ने अपने एक दोहे में कहा है :
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**बूंद समानी समूंद में , जानत है सब कोई; समूंद समाना बूंद में , बूझे बिरला कोई।**
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मैं इस दोहे को प्रेम के संदर्भ में व्याख्या करना चाहूँगा। लोग बूंद हैं और प्रेम समुद्र, लोगों को प्रेम में पड़ते सबने देखा है या सुना है,
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पर जो प्रेम लोगों के अंदर व्याप्त है ये हर कोई नहीं समझता। मैं उस विशेष व्यक्ति का कृतज्ञ हूँ जिसने ने मुझे इस दोहे के मूल भाव का अहसास
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करवाया।
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कभी-कभी डर लगता है, खोने का उसे। आजकल दुनिया में सब अनिश्चित है। कब-क्या हो जाए ये कोई नहीं बता सकता। पहले सिर्फ पृथ्वी थी फिर लोग हुए और
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तब से पृथ्वी अस्थमा की मरीज है। किसी प्रसिद्ध कवि ने लिखा है :
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**आज आदमी में विष इतना भर गया है, की विषधरों का वंश उनसे डर गया है,**
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**कल को कहते सुनोगे , आदमी काटा और साँप मर गया है।**
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ठंडी-ठंडी हवाओं ने मेरी सारी नींद उड़ा दी। प्रकृति शायद मुझे खुश करके मारना चाहती थी। आसमान ने एक बड़े काले पर्दे का रूप ले लिया था और उस
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पर्दे पर दसियो उजले साँप रेंगते नज़र आ रहे थे। मानो दस सालो के टूटते तारे एक साथ दिख रहे हों और आसमान कह रहा हो – जो चाहिए, जितना चाहिए
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माँग लो। और मैंने सच में माँग लिए , लगभग सब कुछ । और उसको हमेशा पास रखने की दुआ तो नहीं माँग सका , पर वो जहां रहे, खुश रहे, सलामत रहे।
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